Copyright ©​ Yogesh Tripathi. All rights reserved.

'ता में एक इतिहास है' नाटक का प्रकाशन, वर्ष 2007 में जयपुर से हुआ है। इस नाटक को रीवा नरेश महाराज विश्वनाथसिंह रचित प्राचीन नीति ग्रंथ 'ध्रुवाष्टक' को आधार बना कर लिखा गया है। इस नाटक में आठ छंदों में राजा को और प्रजा को कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं होना चाहिए, अनेक उदाहरणों के साथ समझाया गया है। इन्हीं उदाहरणों को नाट्य में पिरो कर  यह एक प्रयोग परक नाटक लिखा गया  है, जिसका मंचन पूर्ण आकार में अभी तक नहीं हुआ है।  इस नाटक में वेद, पुराण, इतिहास और पंचतंत्र की अनेक मनोरंजन कहानियाँ हैं, जो ध्रुवाष्टक यानी आठ सत्यों को उजागर करती हैं। 

योगेश त्रिपाठी 

पुस्तक सदन नई दिल्ली से ही वर्ष 2004 में प्रकाशित इस पुस्तक में दो नाटक हैं, पहला 'मुझे अमृता चाहिए' जो हास्य के धरातल पर गंभीर बात कहता है, और दूसरा है - युद्ध। मुझे अमृता चाहिए नाटक में जहाँ  मध्यम वर्ग की एक अवसादग्रस्त लड़की थिएटर के माध्यम से आत्म विश्वास अर्जित करती है और खुद को समाज के लिए उपयोगी महसूस करने लगती है वहीं युद्ध नाटक में 'युद्ध में सिर्फ सैनिक नहीं मरते' सूत्र वाक्य को व्याख्यायित करते हुए युद्ध की भयावहता और निरर्थकता को स्थापित करने की कोशिश की गई है। युद्ध नाटक अत्यंत गंभीर प्रकृति का है और खुले वितान में खेले जाने योग्य है। इन दोनों नाटकों के अनेक मंचन कई निर्देशकों द्वारा किए जा चुके हैं। 

'हस्ताक्षर' योगेश त्रिपाठी की दूसरी पुस्तक है जो वर्ष 1999 में पुस्तक सदन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई। इसमें इसी नाम का केवल एक नाटक है। यह योगेश त्रिपाठी का मंचित होने वाला पहला नाटक है, जब नई दिल्ली के श्रीराम सेंटर और इंडिया हैबीटेट सेंटर में इसके कई प्रदर्शन हुए। सिद्धांतों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले परंतु दोहरे मापदंडों को रखने वाले, सुविधाजीवी बुद्धिजीवियों की पोल खोलता हुआ यह नाटक देश के कई शहरों में खेला जा रहा है। नाटक में त्रयंबक जी ऊँचे आदर्शों की बातें करते हैं, परंतु कुलपति बनने की तिकड़में करते रहते हैं। पुत्री के साथ बलात्कार की कोशिश होने पर वो मंत्री से अपराधी को बचाने के बदले अपने भ्रष्ट बड़े पुत्र की नौकरी बचाने, छोटे पुत्र को नौकरी दिलवाने का सौदा करने से नहीं चूकते। 

'रंग बघेली' पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2014 में मेरठ से हुआ है। रंग बघेली  चार बघेली नाटकों का संग्रह है, जिसमें प्रत्येक नाटक एक से डेढ़ घंटे का है। इसमें 'होइहैं वही जो राम रचि राखा', 'छाहुर', 'बैसाखी' और 'फूलमती' नाटक हैं। 'होइहैं वही जो राम रचि राखा' नाटक मृणाल पांडे के नाटक 'जो राम रचि राखा' का बघेली रूपांतरण है जिसमें दिखाया गया है की किस तरह से पूंजीवादी ताक़तें अपने छल प्रपंचो को भाग्यवाद के आवरण में ढँक कर अंजाम देती हैं।  'छाहुर' बघेलखंड की एक कथा पर आधारित है जिसमें छाहुर नाम का गरीब युवा अन्यायी राजा से टकराता है और जन नायक बन जाता है। 'बैसाखी' नाटक में ग्रामीण लड़की की कथा है जो अपाहिज हो कर भी पढ़ाई नहीं छोड़ती और अपने माँ-बाप को गौरव प्रदान करती है। 'फूलमती' में एक दलित महिला सरपंच हो कर किसी की उंगली के इशारे पर चलने से मना करती है और अपनी पहचान बनाती है। 

प्रकाशित पुस्तकें 

'कागज पर लिखी मौत' योगेश त्रिपाठी की पहली पुस्तक है जिसे नई दिल्ली के प्रतिष्ठित प्रकाशन विद्या प्रकाशन मंदिर ने वर्ष 1997 में प्रकाशित किया था। इस पुस्तक में चार लघु नाटक हैं जिनकी कथावस्तु 'मौत' के इर्द-गिर्द है। पहला नाटक इसी नाम से है जिसमें मृत्यदंड प्राप्त क़ैदी की मनोदशा का चित्रण किया गया है। दूसरा नाटक 'अपने ही पुतले' मनोवैज्ञानिक नाटक है जिसमें एक व्यक्ति के प्रतिशोध के कारण एक निरीह लड़की मारी जाती है। तीसरा नाटक 'आबेहयात' मुंशी प्रेमचंद की इसी नाम की कहानी का नाट्यान्तर है जिसमें मनुष्य की इस प्रवृति  का चित्रण है जिसमें वह दोबारा जन्म पाने पर पिछले जन्म में की गई गलतियों को सुधारने के बजाय फिर से उन्हें दोहराने में जुट जाता है। चौथा और अंतिम नाटक 'प्रलय की दस्तक' एड्स के लिए जनजागरण अभियान के लिए है, जो नुक्कड़ या प्रोसीनियम, दोनों शैलियों में खेला जा सकता है।